Wednesday, 4 January 2012

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The story of "Barbareek" dates back to the "Era of Pandavas and Kauravas or the age of "Mahabharat".
After their escape from the 'Wax Mahal', the Pandvas, alongwith mother 'Kunti', were staying in the forests of "Hidaimb". It was here that the great 'Bhim" killed the demon 'Hidimb' and married the demon's sister named 'Hidimba'.
Hidimba then gave birth to 'Ghatotkach'.  Before he was to be crowned as the ruler of the state, 'Ghatotkach was asked to meet the Pandavas at Indraspath by his mother with an intention of his marriage. .After reaching Indraprasth, 'Ghatotkach expressed the purpose of his visit there.
From there, on orders from Lord Krishna, 'Ghatotkach headed  for 'Mur Mahal' for marrying Morvi, the daughter of Demon 'Mur'.
Observing all precautions as guided by Lord Krishna, 'Ghatotkach could answer all the questions and queries raised by Morvi and put her at ease.  Thus, their marriage ceremony took place there. In due course of time, Morvi gave birth to a son, who like his father ('Ghatotkach), turned up as a matured and grown up man at the very instance of his birth!  Due to his natural curly and thick hair, he was named "BARBAREEK"
In due time, after receivinbg enough skills and learning from Lord Krishna himself, Barbareek was told to visit the Goddess at an undisclosed location and seek divine blessings and powers from her. The Goddess was happy with the devotion of Barbareek and  blessed him with divine powers.  Again, Lord Shiva too, being pleased with the devoted prayers and penance, gifted him with three unfailable arrows. On reaching the forests of 'Hidimb', Barbareek got the news of declaration of war between the Pandavas and Kauravas and came to know that his father too headed towards the battlefield.
Taking permission from his mother and grandmother. Barbareek now proceeds towards Kurukshetra.  While leaving, he promises his mother and grandmother that he will use the three divine arrows only for the protection of the losing side in the battle.
The Pandavas and Kauravas come to know the prowess of Barbareek in the battlefield.  In the meanwhile, Lord Krishna, alongwith Arjuna, come to meet Barbareek. There Barbareek explains to them about the powers of his three special arrows. Lord Krishna now tests the power of the special arrows asking Barbareek to fire them at the leaves of a marked tree,  meanwhile hides a leaf of the tree under his toes. Krishna is amazed to see the reach and accuracy of the arrow that it hits all the marked leaves as well as the hidden leaf under his toes.
The Lord gets disturbed knowing fully well of the impact of Barbareek's oath that he will fire the divine arrows for the protection of the losing side only in the ensuing battle. Krishna does not want to see the 'dharmayuddh' (war against evil) to end that way (i.e. an undesired victory to the Kauravas).  So, Krishna asks Barbareek to donate his head for the sake of 'Devi Chandi' to him.  Happily and without any hesitation, the great warrior cuts off his head on his own and gifts it to Lord Krishna.  Much pleased with his non-selfish act of courage, and to help him see the ongoing battle, Krishna brings nectar from the Goddess and revives (the head of) Barbareek.
As time moves on, the 'Battle of Mahabharat" reaches its destined end. Pandavas now want to take all the credit of victory to themselves. However, the Lord advises them to visit Barbareek, who could witness the whole proceedings of the war in front of his eyes.  Barbareek tells them that he could not see anything during the battle except Lord Krishna and his "Sudarshan Chakra"!  Being moved by the great valour and sacrifice of Barbareek, Krishna blesses him with the name "Shyam", that is his own name bestowed to him by Mother Yashoda.  He also blesses him to be the known Diety of Kalyug and thus to become the saviour of  his devotees.
The head of Barbareek appeared on the 'Khatu's chest and the King of Khandela built a temple of him there.  The same is today known and famous as "KHATU DHAM" or "Shyam Temple"!  Devotees now throng the Khatu Dham to offer their prayers and realise their life aspirations!

बर्बरीक शीश के दानी की कथा पांडव कौरव के युग की है ! लाक्षागृह से बचकर पांडव अपनी माता कुंती के साथ हिडिम्ब वन में जा रहे थे ! जहाँ महाबली भीम ने हिडिम्ब राक्षस को मारकर उसकी बहन हिडिम्बा से विवाह किया ! हिडिम्बा ने भीमपुत्र घटोत्कच को जन्म दिया ! माँ हिडिम्बा ने घटोत्कच को मुखिया बनने से पूर्व विवाह के लिए पांडवो के पास इन्द्रप्रस्थ जाने को कहा ! इन्द्रप्रस्थ जाकर घटोत्कच ने अपने आने का उद्देश्य बताया ! श्रीकृष्ण का आदेश पाकर घटोत्कच मुर दैत्य की पुत्री मौरवी से विवाह की आस लेकर मुर महल पंहुचा ! जहाँ श्रीकृष्ण द्वारा बताई गई सारी सावधानियों को ध्यान रखतें हुए मौरवी के सभी प्रश्नों का सही उत्तर देकर उसे आश्वस्त किया ! घटोत्कच तथा मौरवी का विवाह सम्पन्न हुआ ! समय बीता मौरवी को पुत्र प्राप्ति हुई ! जो पिता घटोत्कच की तरह पैदा होते ही बड़ा हो गया ! उसके केश बर्बराकार होने के कारण उसका नाम बर्बरीक रखा गया ! श्रीकृष्ण से शिक्षा दीक्षा प्राप्ति के पश्चात् उनके आदेशानुसार बर्बरीक दिव्य शक्तियां प्राप्ति के लिए गुप्त् क्षेत्र पहुंचा ! जहाँ देवी ने बर्बरीक की तपस्या से प्रशन्न होकर उसे दिव्य शक्तियां प्रदान की ! और शिवजी ने प्रशन्न होकर उसे तीन अचूक बाण दिए ! हिडिम्बवन पहुच कर बर्बरीक को ज्ञात हुआ की पांडव एवं कौरवो में युद्ध की घोषणा हो चुकी है एवं पिता घटोत्कच भी युद्ध क्षेत्र की ओर प्रस्थान कर गया है माँ एवं दादी से युद्ध देखने की इच्छा लेकर बर्बरीक भी युद्ध क्षेत्र की तरफ चल दिया ! माँ एवं दादी को बर्बरीक ने वचन दिया कि वो इन वाणों का प्रयोग हारने वालें पक्ष के लिए ही करेगा!
बर्बरीक के युद्धक्षेत्र में पहुचने के पश्चात पांडवो को सेनापति से ज्ञातहुआ कि एक युवक युद्ध को अकेले ही क्षणभर में समाप्त करने कि बात कहता है यह सुनकर श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ युवक से मिलने आतें है ! बर्बरीक उन्हें अपने तीनो वाणों कि विशेषता से अवगत कराता है ! श्रीकृष्ण बर्बरीक कि परीक्षा लेने के लिए पेड़ के पत्तो पर बाण चलाने के लिए कहतें है ! श्रीकृष्ण एक पत्ता अपने पैर के नीचे छिपा लेते है जिससे बाण कि पहुँच का पता चल सके ! श्रीकृष्ण यह देखकर अचंभित रह जाते हैं! कि बाण पेड़ के सभी पत्तों के साथ साथ उनके पैर के नीचे दबे पत्ते को भी छेद कर देता है ! यह जानकर कि बर्बरीक इन चमत्कारी बाणों का प्रयोग सिर्फ हारने वाले पक्ष के लिए करेगा, श्रीकृष्ण चिंतित हो जाते हैं ! श्रीकृष्ण नहीं चाहतें हैं कि महाभारत के इस धर्मयुद्ध का निर्णय कौरवों के पक्ष में हो! इसलिए श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से उसका शीश देवी चंडी को बलि देने के लिए दान में मांग लिया ! बर्बरीक ने स्वयं ही सहर्ष अपना शीश काट कर उन्हें दान दे दिया ! श्रीकृष्ण देवी से शीश को अमृत से सीचने को कहतें हैं शीशदान के पश्चात् बर्बरीक कि युद्ध देखने कि इच्छा को श्रीकृष्ण स्वीकार कर लेते हैं !
महाभारत युद्ध समाप्त होता है पांचो पांडव जीत का श्रेय स्वयं लेना चाहते हैं ! श्रीकृष्ण उन्हें इसके लिए बर्बरीक के पास चलने कि सलाह देते हैं !
जिसने सम्पूर्ण युद्ध अपनी आँखों से देखा था !
बर्बरीक उनसे कहतें हैं ! कि उसे तो सम्पूर्ण युद्ध में केवल श्रीकृष्ण एवं उनके सुदर्शन चक्र के सिवाय कुछ दिखाई नहीं दिया ! श्रीकृष्ण बर्बरीक के इस महान त्याग पर अपनी माँ यशोदा द्वारा दिया "श्याम" नाम बर्बरीक को देतें हैं ! तथा कलयुग का भगवान एवं सदा हारे का सहारा बनने एवं खाटू में प्रकट होने का आशीर्वाद देते हैं ! कलयुग में खाटू में उनका शीश प्रकट हुआ! वहां के राजा ने उनका मंदिर बनवाया ! जो आज श्री खाटूश्याम के नाम से विख्यात है ! आज खाटू दरबार में करोडो भक्तों कि मनोकामना पूर्ण हो रही हैं !

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